राजो सिंह के सपनों को वारिस का इंतजार

सत्ता की हनक क्या होती है, इसका अहसास मगध क्षेत्र की जनता सहित पूरे बिहार को राजो सिंह ने कराया था. अपने इलाक़े में उन्होंने विकास की ऐसी कहानी लिखी कि, इस भौगोलिक भूखंड की पहचान ही राजो बाबू से जुड़ गया. चुनावी राजनीति में अपराजेय और विधायी कार्यों में दक्ष राजो सिंह की कमी आज भी लोगों को अखरती है, क्योंकि उनकी विरासत को संभालने का काम अधूरा पड़ा है और विकास को लेकर उनकी परिकल्पना योग्य उत्तराधिकारी की तलाश कर रही है.

शेखपुरा ज़िला राजो बाबू के नाम से ही पहचाना जाता है. कांग्रेस के पूर्व सांसद एवं शेखपुरा ज़िला के संस्थापक कहे जाने वाले स्व. राजो सिंह को यहां के लोग राजो बाबू के नाम से ही जानते हैं. उनकी कार जब राजो सिंह को लेकर पटना से चलती थी, तो ज़िले के चौक-चौराहे पर मालाएं लेकर लोग अपने नेता के आने का इंतज़ार करते थे. राजो सिंह जब अपने क्षेत्र के गांवों का दौरा करते थे, तो ग्रामीण महिलाएं घूंघट काढ़े घरों से निकल पड़ती थीं. दरअसल राजो सिंह ने जनता को यह महसूस कराया कि विकास का रास्ता पटना से ही निकलता है और पटना में जिसकी जैसी ताकत होती है, वह अपने इलाक़े का इसी अनुपात में कायाकल्प कर सकता है. यही वजह थी कि, शेखपुरा के लोगों ने राजो सिंह को दिल खोलकर ताकत दी और राजो सिंह ने भी आजीवन उन्हें निराश नहीं किया.

सत्ता के साथ साझेदारी में समझदारी की राजनीति करने वाले राजो सिंह प्राथमिक स्कूल में शिक्षक थे. उसके बाद वह मुखिया बने और फिर सक्रिय राजनीति में उतरने के बाद वह सांसद बने. शेखपुरा ज़िला की राजनीति में राजो सिंह की अहमियत का अंदाज़ा इस बात से समझा जा सकता है कि, उनके दरबार में उच्चाधिकारियों से लेकर सत्ता के मंत्रिमंडल सदस्यों तक की चौकड़ी लगती थी और ज़िले में मुखिया से लेकर विधायक-सांसद तक चुनाव जीतने के लिए राजो सिंह के आशीर्वाद को जीत का पैमाना मानते थे.

सत्ता के साथ साझेदारी में समझदारी की राजनीति करने वाले राजो सिंह प्राथमिक स्कूल में शिक्षक थे. उसके बाद वह मुखिया बने और फिर सक्रिय राजनीति में उतरने के बाद वह सांसद बने. शेखपुरा ज़िला की राजनीति में राजो सिंह की अहमियत का अंदाज़ा इस बात से समझा जा सकता है कि, उनके दरबार में उच्चाधिकारियों से लेकर सत्ता के मंत्रिमंडल सदस्यों तक की चौकड़ी लगती थी और ज़िले में मुखिया से लेकर विधायक-सांसद तक चुनाव जीतने के लिए राजो सिंह के आशीर्वाद को जीत का पैमाना मानते थे. वर्ष 1972 से राजनीति का स़फर शुरू कर राजनीति में नए कृतिमान स्थापित करने वाले राजो सिंह की 9 सितंबर 2005 में गोली मार कर हत्या दी गई. अपराधियों ने उन्हें आज़ाद हिंद आश्रम में ही गोली मारी जहां वह अधिकारियों के साख विकास कार्यों की समीक्षा कर रहे थे. राजो सिंह के अवसान की यह कहानी वर्ष 2001 में शुरू हुई, जब राजो सिंह के सहयोगी एवं बरबीघा के विधायक रहे महावीर चौधरी की जगह उनके पुत्र अशोक चौधरी विधायक बने और फिर कारा राज्य मंत्री बन बरबीघा की राजनीति की कमान संभाली. अशोक चौधरी ने वर्ष 2001 में बरबीघा की हक़मारी का आरोप लगाते हुए राजो सिंह के वर्चस्व को चुनौती दी. सियासी रंजिश के इस खेल में 26 दिसंबर 2001 को टाटी नरसंहार का रूप लिया, जिसमें ज़िला परिषद सदस्य अनिल महतो, राजद नेता काशी पहलवान सहित कई लोगों को बरबीघा-शेखपुरा पथ पर राजो सिंह के गांव के निकट दिनदहाड़े गोलियों से छलनी कर दिया गया. मारे गए सभी लोग कारा राज्य मंत्री अशोक चौधरी के एक कार्यक्रम में हिस्सा लेकर लौट रहे थे. इस नरसंहार ने ज़िले की राजनीति को नई करवट दी और राजो सिंह समेत उनके पूरे कुनबे को इस मामले में नामज़द करार दिया. इस मामले में उनके मंत्री पुत्र संजय सिंह, भतीजा मृत्युंजय सिंह, दिवाकर सिंह, उदयशंकर सिंह, अरूण सिंह, पौत्र कन्हैया सिंह, समधी वृजनंदन सिंह, कृष्णनंदन सिंह, श्याम सिंह एवं नब्बे वर्षीय मुखिया बांके सिंह को नामज़द किया गया. कभी राजद नेता लालू प्रसाद के क़रीबी रहे राजो सिंह की तत्कालीन रेल मंत्री नीतीश कुमार से बढ़ती नज़दीकियों को लेकर उनकी राजनीति प्रतिद्वंदिता इस क़दर पलटी की वर्तमान मंत्रिमंडल के कई नेता शेखपुरा पहुंच कर राजनीतिक रोटियां सेंकनी शुरू कर दी. शेखपुरा में राजो सिंह द्वारा उद्धाटन और शिलान्यास किए गए सूचना पटों को तोड़ दिया गया. इस मामले में सांसद सहित नामज़द लोगों को जेल में रहना पड़ा और परिणामत: 15 अक्टूबर 2010 को मुंगेर कोर्ट में पेशी के दौरान संजय सिंह का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया.

वर्तमान में उनकी पुत्रवधु सुनीला देवी दो बार विधायिक रहने के बाद, इस बार चुनाव हार गईं और राजनीति में महज खानापूर्ति करने के लिए रह गई हैं. इस चुनाव में जहां सुनीला देवी कांग्रेस की टिकट पर शेखपुरा विधान सभा से चुनाव लड़ रही थी, वहीं उनके पुत्र सुदर्शन बरबीघा विधान सभा से लोजपा की सीट पर चुनाव लड़ रहे थे. हालांकि दोनों सीटों पर मां-बेटे को हार का सामना करना पड़ा. फिलहाल ज़िले की राजनीति में विपक्ष किसी भी मोर्चे पर खड़ी नहीं दिखती. वहीं कभी कांग्रेस का गढ़ कहे जाने वाले इस ज़िले में पार्टी का कोई नामलेवा नहीं है. ग़ौरतलब है कि राजो सिंह के हत्या में पूर्व कारा राज्य मंत्री अशोक चौधरी को भी नामज़द किया गया था. उसके बाद से आज तक कांग्रेसियों के बीच बनी खाई फिलहाल पटने का नाम नहीं ले रहा. मिसाल के तौर पर कभी खुद को कांग्रेस का सच्चा सिपाही कहने वाले राजो सिंह की हत्या के बाद शेखपुरा कांग्रेस कार्यालय में राजो सिंह की प्रतिमा को अनावरण के लिए कपड़ों से ढंक कर रखा गया है, लेकिन एक दशक बाद भी किसी कांग्रेसी नेता को यह सुध नहीं आई कि वह स्व. राजो सिंह की प्रतिमा का अनावरण करा सकें. राजो सिंह राजनीति की, जो विरासत छोड़ गए उसे संभालने वाला कोई नहीं है. विकास के साथ सत्ता का जो मंत्र राजो सिंह पढ़ते थे, उस पर अमल करने वाला कहीं नज़र नहीं आता. शेखपुरा व बरबीघा सहित पूरे मगध को इंतज़ार है, उस हाथ कि, जो उनके विरासत को संभाल सके.

नेताजी कहिन

  • जिन्हें राजो बाबू की विरासत संभालनी थी, वे संजीदा नहीं हैं. राजो बाबू सदन के कार्यकाल का पूरा उपयोग करते थे. बावजूद इसके उनके परिजनों ने कोई सीख नहीं ली. राजो बाबू की कृपा से ललन सिंह व रमेंद्र कुमार जैसे नेताओं ने राजनीतिक फसल काटी, लेकिन इनलोगों ने उनके प्रति कोई सम्मान नहीं जताया.

-    नीरज कुमार (जदयू विधान पार्षद)

  • किसी वटवृक्ष के नीचे दूसरे वृक्ष का पनपना अपवाद ही होता है. राजो बाबू जैसे महान व्यक्तित्व की विरासत को संभालने के प्रति उनके समर्थक गंभीर नहीं रहे, लेकिन इतना तय है कि राजो बाबू ने विकास का जो सपना देखा था, वह हर हाल में पूरा होगा.

-    डॉ. सूर्यमणि सिंह (वरिष्ठ कांग्रेसी नेता)

  • राजो सिंह एक अपराजेय योद्धा थे ,उनका कोई विकल्प नहीं हो सकता है, क्योंकि बेस्ट का कोई विकल्प नहीं होता. जहां तक उनकी विरासत का सवाल है, तो उनके परिजनों से कहीं ज्यादा बिहार के हर ज़िले में उन्हें चाहने वाले लोग उनके सपनों को पूरा कर रहे है

-    सुधीर शर्मा (प्रवक्ता, भाजपा)

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